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शनिवार, 31 अगस्त 2019

उसे देखते ही मैं खुशी से झूम उठी। ऐसा लग रहा था मानो पलंग के नीचे लेटे लेटे वह मुस्काकर मुझे चिढ़ा रहा हो।

आज भी जब मैं इस कलम को देखती हूँ तो मन ही मन मुस्काने लगती हूँ। इस कलम से मेरा रिश्ता ही कुछ अजीब है। दिल मे कितना भी टेंसन हो इस कलम को देखने के बाद सब कुछ भूल जाती हूँ। घर मे अकेली रहने के बाबजूद भी मुझे ऐसा लगता है की कोई तो है जो हमेशा मेरे साथ रहता है। एक बार यह कलम मुझे नही मिल रहा था तो मैं बहुत परेशान हो गई थी। पूरा दिन मैंने इसे अपने घर के सारे कमरे में ढूंढा पर वो नही मिला। अंत में थक हार कर मैं बिस्तर पर लेट गई। मन ही मन मे CBI की तरह सवाल करने लगी कि आखरी बार मैंने इसे इस्तेमाल करके कहाँ रखा था। सोचते सोचते कब आँख लग गई मुझे पता भी नही चला। सोते हुए मैंने सपने में देखा कि मैं स्कूल मे पढ़ा रही हूँ और पिछले बेंच पर बैठा दो बच्चे आपस मे शरारत कर रहा है। तो गुस्से में मैंने उसे कलम फेंक कर मारने की कोशिश की लेकिन कलम तो से उसे नही लगा लेकिन मेरा कलम बेंच के नीचे चला गया। जिसे उठाने के लिए मैं निचे झुकी कलम उठाकर जैसे ही मैं ऊपर उठी तो बेंच के कोने से मुझे चोट लग गया। एक झटके के साथ मेरा नींद भी खुल गया। और मैं उठकर पलंग पर बैठ गई। फिर से मैं कलम के बारे में सोचने लगी। तभी मुझे याद आया कि बेंच के नीचे यानी पलंग के नीचे। मैं झट से पलंग से नीचे उतर गई और पलंग के नीचे देखने लगी। मुझे आश्चर्य होने लगा कि जिसे ढूढने में मैंने सारा घर छान लिया वो यहाँ पड़ा हुआ है। उसे देखते ही मैं खुशी से झूम उठी। ऐसा लग रहा था मानो पलंग के नीचे लेटे लेटे वह मुस्काकर मुझे चिढ़ा रहा हो। तब से इसका ख्याल कुछ ज्यादा ही रखने लगी हूँ। और हमेसा इसे में अपने स्टडी टेबल पर सम्भाल कर रखती हूँ।

school boy


आज भी मुझे याद है जब पहली बार साहिल हमारे स्कूल में नामांकन के लिए आया था तो प्रिंसिपल ने उसका नामांकन सिर्फ इसलिए नही किया क्योंकि वह बोलते समय थोड़ा हकलाता था। मायूस होकर वो अपने पिताजी के साथ वापस लौट रहा था। मैं अपना क्लास खत्म करके प्रिंसपल के कमरे में जा रही थी। तभी स्कूल के बरामदे में पीछे से आई तोतली आवाज ने मुझे चौका दिया। वह अपने पिताजी से तोतली आवाज में बोल रहा था कि " दुसर स्कूल में मेरा नाम लिखा दीजिए " उसकी आवाज सुनते ही मैं सन्न रह गई ऐसा लगा जैसे मुझे जीने का नया बहाना मिल गया हो। उसकी आवाज जाना पहचाना सा बिल्कुल मेरा बेटा प्रिंसू की तरह लग रहा था। मैं दौड़ते हुए उसके पास गई और उससे पूछा क्या हुआ बेटा? उसके चेहरे को देखते हुए मैं उसमे अपने बेटे की चेहरे को तलासने लगी। नयन नक्स आंखे सब कुछ मिल रहा था। लेकिन वो थोड़ा मैला कुचैला और गन्दा दिख रहा था। तभी उसके पिताजी बोले इसका नाम लिखवाने आया था लेकिन हेडमारसा बोले कि तोतला बोलता है इसलिए नाम नही लिखायेगा। मैं उसके पिताजी को बोली कि आप यही रुकिए इसके साथ मैं जाकर प्रिंसपल से बात करती हूँ। और उसे लेकर प्रिंसपल के ऑफिस चली गई जाते वक़्त मैंने उसका नाम पूछा तो उसने अपना नाम साहिल बताया। मैं प्रिंसपल से जाकर मिली और साहिल के नामांकन के बारे में बात करने लगी और उन्हें बताया कि मैं इसे ठीक से बोलना सिखाऊंगी। इसपर प्रिंसपल ने कहा कि वो सब तो ठीक है पर इसके पिता ऑटो रिक्शा चलता है वो समय पर स्कूल का फीस नही भर पायेगा। तब मैंने कहा कि आप नामांकन कर दीजिए मैं इसके पिताजी से बात कर लूँगी। तभी उसके पिताजी भी आ गए। मैंने स्कूल की फीस बगैरह के बारे में सबकुछ उन्हें समझा दिया। और साहिल को साफ सुथरे कपड़े पहनकर कल से स्कूल आने के लिए कह दिया।


अगले दिन मैं स्कूल के गेट पर खड़े होकर साहिल के आने का इंतजार कर रही थी। तभी साहिल अपने पिता के ऑटो में सवार होकर आया और उसके पिता ऑटो से उतरकर उसको छोड़ने के लिए गेट तक आये वहाँ से मैं उसे अपने साथ क्लास तक लेकर आई। आज स्कूल ड्रेस में साहिल बहुत सुन्दर लग रहा था। बिल्कुल मेरा बेटा प्रिंसू की तरह। मैं उससे ढेर सारी बातें करना चाह रही थी तभी स्कूल की घंटी लग गई। सब बच्चे अपने अपने क्लास में आ गए मैं भी अपने क्लास लेने चली गई। स्कूल की छुट्टी होने पर मैं उससे क्लास रूम से गेट कि दूरी तक ही बात कर पाती। मैं चाहती थी कि उसके साथ कहीं घूमने टहलने जाऊ और उससे बातें करती रहूँ लेकिन ऐसा नही हो पाता क्योंकि उसके पिता ऑटो लेकर स्कूल के बाहर ही उसे ले जाने के लिए खड़े रहते थे। करीब छह सात महीना तक इसी तरह चलता रहा इस बीच प्रिंसपल से उसके पिता को तीन बार डाँट खाना पड़ा था क्योंकि उसके पिता ने स्कूल की फीस भरने में लेट कर दिया था। शिक्षक दिवस के अवसर पर साहिल ने मुझे एक गिफ्ट दिया था। तो मैंने उससे पूछा कि गिफ्ट खरीदने के लिए पैसे कहाँ लाया तो उसने कहा कि यह गिफ्ट मेरी मम्मी ने मुझे आपको देने के लिए दिया है। मैंने उससे पूछा कि इसे खोल के देखूँ तब उसने कहा नही इसे घर पर खोलियेगा। और मैं उस गिफ्ट को लेकर घर आ गई थी। उसे खोलकर देखा तो उसमें कलम था। जिसे आज भी मैं सम्भाल कर रखी हूँ। अगले दिन जब मैं स्कूल गई तो साहिल स्कूल नही आया था। उसके दोस्तों से पता किया तो पता चला कि अब वो स्कूल नही आयेगा। प्रिंसपल सर ने उसका नाम काट दिया है...


नोट:- कहानी अभी जारी है इसका शेष भाग अगले पोस्ट में प्रकाशित किया जाएगा। इस कहानी के अगले भाग का नोटिफिकेशन पाने के लिए हमारे वेबसाइट को फॉलो करें या ईमेल आईडी के द्वारा सब्सक्राइब करें या हमारे फेसबुक पेज biharpatna.com को लाइक करें


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