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बुधवार, 3 जुलाई 2019

बदन में शरीर ढकने के नाम पर एक मैली सी धोती और गमछा था। दोनों हाथों से खैनी बनाता हुआ वह मन मे संतोष लिए बैठा हुआ था।


आसमान में बादल छाया हुआ था। बारिश कभी भी हो सकता है ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था। मैं तेजी से चलते हुए स्टेशन की तरफ बढ़ रहा था। फुटपाथ पर सामान बेचने बाला जल्दी जल्दी अपने सामान को प्लास्टिक से ढक रहा था। स्टेशन पहुँचते ही सबसे पहले मैंने समय सारणी में ट्रेन की लिस्ट को देखा। तीन बजके कुछ मिनट में पूर्वा ट्रैन आने बाली थी। अभी ढाई बज रहा था। उससे पहले भी दो ट्रेनें थी लेकिन उसे पूर्वा के द्वारा सेंटिंग मार दिया जाएगा। ऐसा मैंने अपना हिसाब किताब लगाया। चलो इसी बहाने स्टेशन पर भी थोड़ी देर घूम टहल लिया जाएगा। यह सोचकर मैं प्लेटफार्म नम्बर दो पर चला गया।

सवारी गाड़ी के इंतजार में एक वृद्ध व्यक्ति प्लेटफार्म नंबर दो पर बैठा हुआ था। और बगल में एक लाठी रखा हुआ था जो बीच से आधा फटा हुआ था। बदन में शरीर ढकने के नाम पर एक मैली सी धोती और गमछा था। दोनों हाथों से खैनी बनाता हुआ वह मन मे संतोष लिए बैठा हुआ था। कई एक्सप्रेस ट्रेन आकर रुकी और चली भी गई। लेकिन वो वृद्ध व्यक्ति वही बैठा सवारी गाड़ी के आने का इंतजार कर रहा था। जब मैं वहाँ से तीसरी बार गुजरा तो देखा वृद्ध व्यक्ति अब भी वही बैठा था।

मैंने उनसे पूछा कहाँ जैबहो बाबा बरी देर से यहाँ बइठल हो?

झझवा के इंतजार में हियो, बिया लेबेल अइलीयो ह, बारहे बजे से बइठल हियो।

त बिया लेला...... खालिये हाथे ह?

नय लेलियो जेकरा हीसे ले हलियो ओकर दुकाने बंद हलो।

त दूसरा हिया से ले लेता हल?

बतिया नय न समझ हो बौआ दु हजार रुपैवे है
अब केतना के बिया होतय पचीस्सो लगतय की तीन हजार। सब उधारे नय न दे है। जेकरा ही से ले हियय उ उधारे दे दे हैं।

किसान सब के मोदी जी दु हजार रुपैया बैंक में दे हखुन उ मिललो तोरा?

हमरा उ सब बुझझे आब हको बौआ
एगो बकरी पोसले हलीयो ओकरे तेईस सो में बेच देलियो तीन सौ घरे देलियो आव दुहजार लेके अइलीयो ह। छोटका पोतवा बरी कानअ हलो बाबा बकरिया नय बेचअ...

ये सब सुनते ही मेरा मन भी भर आया। सरकार क्या क्या योजनायें लाती है। टीबी में, समाचार पत्रों में, इंटरनेट पर हमें देखने और सुनने को मिलता है कि किसान के लिए सरकार ने तरह तरह योजनाओं को लागू किया है। मैं और भी बहुत कुछ उनसे पूछने बाला था लेकिन हमारी ट्रेन आ चुकी थी।

ट्रैन में चढ़ने के बाद मेरे मन मे बहुत सारे सवाल थे जो मैं उनसे पूछना चाहता था। मन तो कर रहा था कि जाकर पूछ ही लू लेकिन ट्रैन खुल चुकी थी।
मैं अपने मन से ही सवाल करने लगा। क्या सरकार की एक भी योजनाओं का लाभ इन जैसे गरीब किसानों को मिल पाता होगा? इन लोगों के मन बस यही बात रहती होगी कि मेहनत करो और बस मेहनत करो। फल की तो आशा भी नही करो क्योंकि कब बारिश होगी नही होगी फसल होगा की नही होगा। सब ऊपर बाले के हाँथ में है। यहाँ पर सभी इंजीनियरिंग फैल हो जाता है। सभी पढ़ाई लिखाई बेकार हो जाते है। फलाना ढिकाना सब जहाँ का तहाँ रह जाता है। चाहे सरकार किसी का भी हो जब तक देश मे सरकारी अधिकारी ईमानदार नही होगा तब तक उचित लोग इसी तरह योजनाओं से बंचित रहेगा।

यहाँ देखिये किसान क्यों करते है आत्महत्या?

सायद देश मे इसी तरह के गरीब किसान फसल बर्बाद होने से आत्महत्या कर लेते होंगें। जब तक जिन्दा थे कोई पूछने बाला नही था। मरने के बाद विपक्ष के नेता आएंगे। मिट्टी का शरीर पार्थिक हो जाएगा। इसे मुद्दा बनाकर मीडिया में उछाला जाएगा। खबरें बनेंगी टीबी पर डिबेट होगा। इसके लिए सभी को पैसे मिलेंगें। जिसके जिंदा रहने पर सिर्फ एक बीज बेचने बाला दुकानदार जनता था। लेकिन मरने के बाद पूरा शहर जानेगा। इतना सबकुछ हो गया लेकिन पढ़ने के बाद कुछ लोग तो कमेंट्स भी नही करेंगे

1 टिप्पणी:

  1. बहुत मार्मिक, लेकिन इन्ही योजना के पैसे से भी कई लोगो का घर चलता है...

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