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शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

बख्तियारपुर प्रखंड के इस गाँव मे मनाया जाता है गुरु पूर्णिमा। भाड़ी संख्या में इकट्ठा होते है भक्त।


बख्तियारपुर प्रखंड के इस गाँव मे मनाया जाता है गुरु पूर्णिमा। भाड़ी संख्या में इकट्ठा होते है भक्त।


गुरु पूर्णिमा का महत्व

भारतीय संस्कृति के अनुसार गुरु को भगवान का दर्जा दिया गया है। जिसकी चर्चा धार्मिक ग्रन्थों में भी की गई है। गुरु से ही हम अपने जीवन के असली मकसद को पहचानते है। गुरु ही हमें सही और गलत की पहचान करने के लिए सीखते है। गुरु से हम ज्ञान प्राप्त करते है। गुरु से हम गुण प्राप्त करते है। गुरु के इतने सारे महत्व को देखते हुए गुरु पूर्णिमा का दिन निश्चित किया गया है। गुरुओं में सबसे क्षेष्ठ महर्षि वेदव्यास को माना गया है। जिनके जन्मदिन के अवसर पर हम गुरु पूर्णिमा का त्यौहार मानते है।

गुरु पूर्णिमा कब मनाया जाता है?

बर्षा ऋतु की शुरुआत होते ही चार महीने तक साधु संत एक ही जगह रहते है। एक ही जगह पर बैठकर वे अपनी साधना करते है। इस समय न तो ज्यादा गर्मी होती है और न ही ज्यादा ठंड होती है। और ऐसा माना जाता है कि बारिस होने की बजह से साधु संत एक ही जगह पर रहते है। और अपनी कथा वाचक करते है ज्ञान की गंगा बहाते है। मौसम की दृष्टि से भी यह चार महीने उत्तम होता है। भारतीय हिन्दी महीने के अनुसार आषाढ महीना के पूर्णिमा के दिन गुरुओं में सबसे क्षेष्ठ महर्षि वेदव्यास जी के जन्मदिन के अवसर पर गुरु पूर्णिमा मनाया जाता है।

गुरु पूर्णिमा का त्योहार कैसे मानते है?

आषाढ महीना के पूर्णिमा के दिन गुरू पूर्णिमा मनाया जाता है। इस दिन गुरू को साक्षात भगवान का रूप माना जाता है। गुरू के महत्व को समझकर उनकी पूजा की जाती है। इस दिन गुरू पूर्णिमा के दिन विद्यार्थियों के लिए कल्याणकारी माना जाता है। विद्यार्थियों को इस दिन अपने गुरू का चरण स्पर्श कर आशिर्वाद लेना चाहिए। गुरू पूर्णिमा के दिन अपने गुरू को फल, वस्त्र इत्यादि दान करने का रिवाज है। इस दिन अपने गुरू को प्रसन्न करके आशीर्वाद लेने से माता सरस्वती की कृपा उनपर बनी रहती है। कुल मिलाकर गुरू पूर्णिमा के दिन शिष्य को अपने गुरू के प्रति आदर भाव प्रकट करना है। इस तरह से गुरू पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है।

कहाँ मनाया जाता है गुरू पूर्णिमा का त्योहार?

गुरू पूर्णिमा का त्योहार ऐसे तो भारत के कई हिस्सों में मनाया जाता है। हर साल की तरह इस साल भी  बख्तियारपुर से 6 किलोमीटर पश्चिम मोगलपुरा पंचायत के लखनपुरा गाँव मे नैया बाबा का समाधि स्थल है। वही पर अंग्रेजी महीना के अनुसार इस बार 16 जुलाई को गुरू पूर्णिमा का पर्व मनाया जाएगा। इस पर्व को मनाने के लिए यहाँ पर दूर दूर से लोग आते है। जिससे लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाती है। और दिनभर मेले जैसा महौल बना रहता है।

कौन थे नैया बाबा?

जानकारों के अनुसार नैया बाबा सत्य के खोज में निकले थे। इसलिए वे गंगा नदी में ही रहते थे। एक नाव पर उनकी कुटिया बनी हुई थी उसी में वो रहते थे। कभी कभी वो गंगा नदी के किनारे आते थे तो उन्हें देखने के लिए भीड़ इकट्ठा हो जाता था। उन्होंने अपने संत बाले जीवन काल में कभी किसी को पैर छूने नही दिए। जब वो गंगा नदी में बालू पर चलते थे तो लोग उनके पैर के नीचे की बालू को आशीर्वाद समझ कर उठा लेते थे। और उन्हें अपना गुरू मानते है। जब उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया तो इसी जगह पर उनकी समाधि बनाई गई। जिसे बाद में सुन्दर सा रूप दिया गया। उसके बाद से यहाँ पर गुरू पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है।

विडियो में देखिए नैया बाबा समाधि स्थल लखनपुरा




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